मेरे जीवन के संघर्ष की पहली कहानी l Mere jivan ke sangharsh ki pahali kahani
सभी को मेरा प्यार भरा नमस्ते और धन्यवाद मेरी कहानी पड़ने के लिए.☺
आज की कहानी मेरे जीवन के उन संघर्षपूर्ण दिनों की है जब मेरे जीवन का सबसे मुश्किल दौर चल रहा था तो चलिए शुरू करते है
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मेरा नाम है दीपक मेरी जिंदगी का सफ़र शुरू होता है जयपुर एक छोटे से गाँव से तारीख 17-09-1995. मेरे परिवार में मेरे दो बड़े भाई मम्मी पापा और दादाजी रहते थे. एक सामन्य सा मध्यमवर्गीय परिवार जिसको पालने का पूरी जिम्मेदारी मेरे पिताजी जिनका नाम राम प्रसाद योगी था. वह एक लोहे के कारखाने में कम किया करते थे जिनकी तन्खा से परिवार बहुमुश्किल से चल पाता था.
ऐसे ही समय गुजरता चला गया और मेरी उम्र अब 10 साल हो चुकी थी और साथ ही पिताजी की उम्र ढलने लाही थी अब उनका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा था. मेरे को अब समझ आने लगा था की मेरे परिवार की आर्थिक स्थति ठीक नही है इसलिए मैंने भी पढाई छोड़ कर कोई नौकरी करने का मन बना लिया था. उस समय बाल मजदूरी को क़ानूनी रूप में अपराध नही माना जाता था जिससे मुझे कम उम्र में भी आसानी एक छोटी सी चाय की दुकान पर काम मिल गया था . अब मैंने घर पर बिना बताये एक चाय की दुकान पर काम करने लगा था जिस वजह से मैं अब स्कूल नही जा रहा था. मैने यह काम के बारे में अभी तक घर पर किसी कों कुछ नही बताया था. कुछ समय में ही स्कूल से मेंरे घर शिकायत पहुँच जाती है की में बहुत समय से स्कूल नही आ रहा हूँ.
जब यह बात घर पर पता चली तो पिताजी की डाट के साथ साथ मार भी पड़ी पिताजी की यह पहली मार थी जिसकी वजह से मेरे को गुस्सा भी बहुत आया ऐसा अहसास हो रहा था जेसे बहुत सारे दुखों का पहाड़ मेरे उपर टूट पड़ा हो मन कर रहा था घर छोड़ कर कही चला जाऊ परन्तु यह सब मेरा बचपना था. कुछ समय बाद पिताजी ने बड़े प्यार से अपने पास बिठाया और समझाया की यह समय मेरे काम करने का नही है बल्कि खेलने को पढ़ने का जिसमे जीवन में कुछ बड़ा मुकाम हांसिल करू.
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( सही समय पड़ी हुई मार और सही समय पर दी गयी सिख जीवन मैं हमेशा महत्वपूर्ण योगदान देती है )
4 साल बाद जब मेरी उम्र लगभग 16 साल हो गयी है में अब चीजो को और सही तरीके से समझने लगा था. दुनिया में समय के साथ साथ बदलवा होते जा रहे थे और मैने अपनी क्लास 10th 88% से उतीर्ण कर ली थी जिससे पिताजी बहुत खुश थे. पिताजी को बहुत समय बाद इतना खुश देखा था जिस दिन परिणाम आया था उस ख़ुशी के मोंके पर घर मैने पकवान बनाते है और घर का माहोल बहुत ही खुशनुमा हो जाता है जैसे को त्यौहार हो.
गावं में स्कूल क्लास 10 तक ही हुआ करता था. जिसकी वजह से सभी भाई बहनों ने सिर्फ क्लास 10 तक ही पढ़ाई की थी. परन्तु मेरी पढाई में रूचि को देखते हुये पिताजी ने मुझे शहर भेजने का निर्णय ले लिया था. परन्तु यह पिताजी के लिये इतना आसन नही होने वाला था फिर भी पिताजी ने मेरा एक निजी स्कूल में commerce विषय में दाखिला दिला दिया और स्कूल के ही हॉस्टल में ही अब में रहने लगा था जिससे पिताजी के कंधो पर एक और बोझ आ गया था.
आगे की कहानी दुसरे भाग मैं................


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